पहाड़ों पर उस शाम बारिश होने वाली थी।
आसमान बिल्कुल धूसर था। दूर बर्फ से ढकी चोटियों के ऊपर बादल ऐसे जमा थे, जैसे किसी ने नीले आसमान पर उदासी की चादर डाल दी हो। देवदार के पेड़ हवा के साथ लगातार झूम रहे थे और पहाड़ी रास्ते पर हमारी जीप धीरे-धीरे ऊपर चढ़ रही थी।
मेरे साथ अनाया बैठी थी।
वह खिड़की के बाहर देख रही थी। उसके बाल हवा में बार-बार चेहरे पर आ रहे थे और वह हर बार उन्हें कान के पीछे कर देती।
अचानक उसने जीप रुकवा दी।
“क्या हुआ?” मैंने पूछा।
वह नीचे उतर गई।
सामने एक छोटी-सी पहाड़ी थी, जिसके ऊपर बादल इतने नीचे आ गए थे कि लगता था हाथ बढ़ाओ तो उन्हें छू सकते हो।
अनाया ने दोनों हथेलियाँ जोड़ लीं।
मैं मुस्कुराया।
“तुम भी प्रार्थना करती हो?”
उसने आँखें बंद रखते हुए कहा,
“हाँ।”
“भगवान से क्या माँग रही हो?”
उसने आँखें खोलीं और मेरी तरफ देखा।
“कुछ चीज़ें माँगी नहीं जातीं, कबीर… बस हवा के हवाले कर दी जाती हैं।”
मैं उसकी बात समझ नहीं पाया।
“और अगर हवा उन्हें कहीं ले गई तो?”
वह मुस्कुराई।
“तो शायद उन्हें वहीं पहुँचना होगा, जहाँ उनकी ज़रूरत है।”
उस दिन मुझे पहली बार लगा कि अनाया साधारण लड़की नहीं थी।
वह रास्तों को सिर्फ रास्ते नहीं समझती थी।
उसके लिए हर मोड़ के पीछे कोई कहानी थी।
हम दोनों कॉलेज के पुराने दोस्त थे, लेकिन पिछले कुछ महीनों में हमारी दोस्ती के बीच एक ऐसी खामोशी आ गई थी, जिसका नाम हम दोनों जानते थे।
मोहब्बत।
बस कहने की हिम्मत किसी में नहीं थी।
हम ऋषिकेश से एक छोटे-से पहाड़ी गाँव की तरफ जा रहे थे। अनाया को पुराने पहाड़ी मंदिरों और सुनसान रास्तों की तस्वीरें खींचने का शौक था और मुझे बिना किसी योजना के सफ़र पर निकल जाना।
शायद इसी वजह से हम साथ थे।
उस शाम बारिश शुरू हो गई।
एक छोटे-से ढाबे के बाहर हम रुक गए। टीन की छत पर गिरती बारिश की आवाज़ इतनी तेज़ थी कि हमें एक-दूसरे से बात करने के लिए थोड़ा करीब झुकना पड़ रहा था।
अनाया ने चाय का कप मेरी तरफ बढ़ाया।
“तुम जानते हो, कबीर?”
“क्या?”
“लोग मंज़िल को बहुत गंभीरता से लेते हैं।”
“तो?”
“मुझे रास्ते पसंद हैं।”
मैंने हँसकर पूछा, “क्यों?”
उसने खिड़की से बाहर देखते हुए कहा—
“क्योंकि रास्ते किसी से वादा नहीं करते कि वे तुम्हें कहाँ पहुँचाएँगे।”
मैं कुछ देर चुप रहा।
फिर मैंने पूछा, “और अगर रास्ते में कोई अपना मिल जाए?”
उसने मेरी तरफ देखा।
इस बार उसकी आँखों में मुस्कान नहीं थी।
“तो सफ़र थोड़ा मुश्किल हो जाता है।”
उस रात हम गाँव के एक छोटे-से लकड़ी के घर में रुके।
बिजली चली गई थी।
अनाया खिड़की के पास बैठकर अँधेरे पहाड़ों को देख रही थी।
मैंने मोबाइल की टॉर्च बंद कर दी।
कमरे में सिर्फ़ बारिश और हवा की आवाज़ बची।
“कबीर?”
“हूँ।”
“क्या तुम्हें कभी डर लगता है कि कोई बहुत अपना होकर भी एक दिन बहुत दूर चला जाएगा?”
उस सवाल ने मेरे भीतर कुछ हिला दिया।
मैंने कहा, “हाँ।”
“कौन?”
मैंने जवाब नहीं दिया।
वह भी चुप हो गई।
कुछ देर बाद उसने धीमे से कहा—
“मुझे कल वापस जाना है।”
मैंने सोचा वह शहर लौटने की बात कर रही है।
लेकिन अगले दिन मुझे पता चला कि वह सिर्फ़ शहर नहीं लौट रही थी।
वह विदेश जा रही थी।
छह महीने के लिए।
शायद उससे भी ज्यादा।
बस अड्डे पर हम दोनों खड़े थे।
बारिश थम चुकी थी।
सड़क पर पानी की पतली धार बह रही थी।
अनाया के हाथ में वही छोटा-सा बैग था, जो उसने पूरे सफ़र में अपने कंधे पर टाँग रखा था।
बस आने में कुछ मिनट थे।
मेरे पास कहने के लिए बहुत कुछ था।
लेकिन अजीब बात थी कि जितना बड़ा एहसास होता है, उतने ही छोटे शब्द पड़ जाते हैं।
मैंने बस पूछा—
“वहाँ जाकर पहाड़ याद आएँगे?”
वह मुस्कुराई।
“पहाड़ नहीं।”
“फिर?”
उसने मेरी आँखों में देखते हुए कहा—
“यह सफ़र।”
बस आ गई।
वह चढ़ गई।
खिड़की से हाथ बाहर निकाला।
मैं वहीं खड़ा रहा।
बस आगे बढ़ती गई।
कुछ दूर जाकर उसने खिड़की से एक छोटा-सा कागज़ बाहर फेंका।
हवा उसे मेरी तरफ लेकर आई।
उस पर सिर्फ़ एक लाइन लिखी थी—
“कभी-कभी किसी इंसान तक पहुँचने के लिए बहुत लंबा सफ़र करना पड़ता है।”
मैंने वह कागज़ अपनी जेब में रख लिया।
उसके बाद छह महीने बीत गए।
मैं रोज़मर्रा की जिंदगी में लौट आया।
ऑफिस, घर, ट्रैफिक, लोगों की भीड़।
लेकिन मन?
मन अब भी उसी पहाड़ी रास्ते पर था।
कभी किसी चाय की खुशबू में मुझे वह ढाबा याद आता।
कभी बारिश की आवाज़ में उसकी हँसी सुनाई देती।
कभी किसी पहाड़ी तस्वीर को देखकर लगता, जैसे वह अभी फोन करके कहेगी—
“कबीर, यहाँ चलोगे?”
एक रात मैं ट्रेन से अपने शहर लौट रहा था।
खिड़की के बाहर अँधेरा भाग रहा था।
मैंने फोन खोला।
अनाया का कोई संदेश नहीं था।
मैंने खुद को समझाया कि कुछ लोग जिंदगी में आते हैं और फिर रास्तों की तरह आगे निकल जाते हैं।
उसी वक्त फोन पर एक संदेश आया।
“कबीर, क्या तुम्हें वह पहाड़ी याद है जहाँ मैंने प्रार्थना की थी?”
मेरी उँगलियाँ स्क्रीन पर रुक गईं।
मैंने जवाब दिया—
“हाँ।”
कुछ सेकंड बाद उसका दूसरा संदेश आया।
“मैं वापस आ गई हूँ।”
मैंने पूछा—
“कहाँ?”
उसका जवाब आया—
“उसी शहर में जहाँ से हमारा सफ़र शुरू हुआ था।”
मेरी धड़कन अचानक तेज़ हो गई।
फिर उसने लिखा—
“इस बार सफ़र अकेले मत करना।”
मैं देर तक उस संदेश को देखता रहा।
ट्रेन अपनी रफ्तार से दौड़ रही थी।
बाहर अँधेरा था।
लेकिन पहली बार मुझे लगा कि अँधेरा भी रास्ता रोक नहीं सकता।
मैंने टिकट ऐप खोला।
अगली सुबह की बस पहाड़ों के लिए थी।
मैंने टिकट बुक कर लिया।
शायद कुछ सफ़र मंज़िल पाने के लिए नहीं होते।
वे इसलिए होते हैं ताकि हम समझ सकें कि हमारे भीतर कौन-सा रास्ता अब भी अधूरा है।
अगली सुबह जब मैं पहाड़ पर पहुँचा, अनाया वहीं खड़ी थी।
वही पहाड़ी।
वही हवा।
वही बादल।
बस इस बार उसके हाथ जुड़े हुए नहीं थे।
वह मेरी तरफ देखकर मुस्कुरा रही थी।
मैंने पूछा—
“आज कोई प्रार्थना नहीं?”
उसने सिर हिलाया।
“नहीं।”
“क्यों?”
वह मेरे पास आई और बोली—
“जिस चीज़ के लिए प्रार्थना की थी, वह खुद चलकर मेरे पास आ गई।”
मैं कुछ नहीं बोल पाया।
हम दोनों कुछ देर पहाड़ के किनारे खड़े रहे।
नीचे बादल बह रहे थे।
हवा हमारे बीच से गुजर रही थी।
और मुझे अचानक समझ आया—
सफ़र हमेशा शहरों के बीच नहीं होता।
कभी-कभी सफ़र दो दिलों के बीच होता है।
एक दिल से दूसरे दिल तक पहुँचने में साल लग सकते हैं।
कभी कुछ कदम।
और कभी पूरी जिंदगी।
मैंने अनाया से पूछा—
“अब बताओ, सफ़र का मतलब क्या है?”
उसने मेरी तरफ देखा।
फिर मेरा हाथ पकड़कर बोली—
“शायद किसी ऐसी जगह पहुँच जाना, जहाँ पहुँचने के बाद लगे कि हम कहीं गए ही नहीं थे।”
मैं मुस्कुराया।
“मतलब?”
उसने आसमान की तरफ देखा।
“मतलब… हम जहाँ जाना चाहते थे, वहीं तो पहले से थे।”
उस दिन पहाड़ पर फिर बारिश शुरू हो गई।
हम दोनों भीगते हुए नीचे उतरने लगे।
मगर इस बार कोई जल्दी नहीं थी।
क्योंकि हमें पहली बार समझ आया था—
कुछ रास्ते मंज़िल तक नहीं ले जाते।
वे हमें उस इंसान तक ले जाते हैं, जिसके बिना मंज़िल भी अधूरी लगती है।






