Prayagraj की गलियों से शुरू हुई एक अधूरी कहानी
Prayagraj की शामों में कुछ ऐसा है जिसे शब्दों में समझाना मुश्किल है।
संगम की तरफ़ से आती हवा जब पुराने शहर की गलियों से गुजरती है, तो लगता है जैसे वह अपने साथ किसी बीते हुए समय की आवाज़ लेकर चल रही हो। मैं कई सालों से Prayagraj में नहीं रहता, लेकिन जब भी किसी कारण से इस शहर का नाम सुनता हूँ, मेरे भीतर एक पुरानी खिड़की खुल जाती है।
उस खिड़की के पीछे मीरा खड़ी दिखाई देती है।
मीरा मेरी प्रेमिका नहीं थी।
कम-से-कम हमने कभी एक-दूसरे से यह नहीं कहा था।
लेकिन शायद कुछ रिश्ते नाम माँगते ही नहीं।
हमारी पहली मुलाक़ात Prayagraj के एक छोटे-से पुस्तकालय में हुई थी। वह किताब लौटाने आई थी और मैं किताब लेने के बहाने उसी मेज़ के पास बैठा था, जहाँ वह रोज़ बैठती थी।
उसने एक दिन अचानक पूछा,
“तुम रोज़ यहाँ क्यों आते हो?”
मैंने कहा, “किताबें पढ़ने।”
वह हँसी।
“झूठ बोलना तुम्हें आता नहीं है।”
मैंने पहली बार उसकी तरफ़ ठीक से देखा।
“तो बताओ, क्यों आता हूँ?”
उसने किताब बंद की और बोली,
“शायद तुम्हें किसी का इंतज़ार रहता है।”
वह बात मज़ाक में कही गई थी, लेकिन जाने क्यों वह मेरे भीतर उतर गई।
उस दिन से Prayagraj की गलियाँ मुझे पहले से अलग दिखाई देने लगीं।
सिविल लाइंस की भीड़, पुराने मकानों की दीवारें, शाम को चाय की दुकानों पर जमा लोग और बारिश के बाद सड़कों पर चमकती पीली रोशनी—हर जगह जैसे मीरा की कोई छोटी-सी मौजूदगी थी।
हम दोस्त बन गए।
फिर दोस्ती ऐसी आदत बनी कि उसके बिना दिन अधूरा लगने लगा।
हर रविवार हम यमुना किनारे चले जाते।
वह पत्थर उठाकर पानी में फेंकती और कहती,
“देखो, एक छोटा-सा पत्थर भी पानी में कितनी दूर तक हलचल पैदा कर देता है।”
मैं पूछता,
“और इंसान?”
वह मुस्कुराती।
“इंसान तो बिना कुछ किए भी किसी की पूरी जिंदगी बदल सकता है।”
मैं उस समय उसकी बात का अर्थ नहीं समझ पाया था।
शायद वह खुद भी नहीं समझती थी।
एक सर्द सुबह उसने बताया कि उसे Prayagraj छोड़ना पड़ेगा।
उसके पिता का तबादला हो गया था।
“कितने दिनों के लिए?”
“शायद हमेशा के लिए।”
उसने यह बात बहुत आसानी से कह दी।
लेकिन मेरे लिए वह दो शब्द नहीं थे।
वह जैसे किसी ने मेरे रोज़ के जीवन से एक पूरा अध्याय निकालकर फेंक दिया हो।
उसके जाने से एक दिन पहले हम उसी पुराने पुस्तकालय की सीढ़ियों पर बैठे थे।
मैंने पूछा,
“तुम्हें Prayagraj की सबसे अच्छी चीज़ क्या लगेगी?”
उसने बिना सोचे कहा,
“तुम।”
मैं हँस पड़ा।
“मैं शहर हूँ क्या?”
वह भी हँसी।
“नहीं। लेकिन इस शहर में तुम मिले थे।”
उसके बाद कुछ देर हम दोनों चुप रहे।
कई बार प्रेम का सबसे सच्चा रूप वही होता है, जहाँ कोई कुछ कहता नहीं।
अगली सुबह वह चली गई।
मैं उसे स्टेशन छोड़ने गया।
ट्रेन चलने लगी तो उसने खिड़की से हाथ बाहर निकाला।
“अपना ख़याल रखना।”
मैंने पूछा,
“और तुम?”
वह बोली,
“मैं जहाँ रहूँगी, वहाँ भी Prayagraj ढूँढ़ लूँगी।”
ट्रेन चली गई।
मैं प्लेटफॉर्म पर खड़ा रहा।
लोग आते-जाते रहे।
चाय वाले ने गिलास उठाए।
घोषणाएँ होती रहीं।
लेकिन मुझे ऐसा लगा जैसे स्टेशन की सारी आवाज़ें अचानक बहुत दूर चली गई हों।
समय आगे बढ़ता गया।
मैंने नौकरी शुरू कर दी।
नए लोग मिले।
नई जगहें देखीं।
लेकिन Prayagraj मेरे भीतर वहीं रुका रहा।
कभी किसी पुराने गीत में मीरा की आवाज़ सुनाई देती।
कभी सड़क किनारे चाय पीते हुए लगता कि वह सामने बैठकर पूछेगी,
“इतनी चुप्पी क्यों है?”
कभी रात को अचानक नींद खुलती और मुझे लगता कि मैं उसी पुराने कमरे में हूँ, जहाँ खिड़की से Prayagraj की सर्द हवा अंदर आती थी।
फिर एक दिन मुझे उसका संदेश मिला।
सिर्फ़ चार शब्द थे—
“मैं Prayagraj में हूँ।”
मैं बहुत देर तक फोन देखता रहा।
फिर उसने दूसरा संदेश भेजा—
“मिलोगे?”
अगली शाम मैं उसी जगह पहुँचा जहाँ हम कभी बैठा करते थे।
वह सामने खड़ी थी।
कुछ बदली हुई।
लेकिन उसकी आँखें वैसी ही थीं।
मैंने पूछा,
“कितने दिनों के लिए आई हो?”
उसने कहा,
“पता नहीं।”
मैं मुस्कुराया।
“तुम्हें अब भी जवाब नहीं पता।”
वह बोली,
“कुछ सवालों के जवाब पता चल जाएँ तो शायद उनकी खूबसूरती खत्म हो जाती है।”
हम दोनों धीरे-धीरे संगम की तरफ़ चलने लगे।
काफी देर बाद उसने पूछा,
“तुमने मुझे कभी याद किया?”
मैंने कहा,
“हर उस दिन जब Prayagraj याद आया।”
वह रुक गई।
“और Prayagraj कब याद आया?”
मैंने उसकी तरफ देखा।
“जब भी मुझे घर याद आया।”
उसकी आँखें भर आईं।
उसने कुछ नहीं कहा।
हम नदी के किनारे बैठ गए।
सूरज धीरे-धीरे नीचे उतर रहा था।
मैंने पूछा,
“मीरा, हमारे बीच आखिर था क्या?”
उसने पानी की तरफ देखते हुए कहा,
“शायद वह चीज़, जिसे हम दोनों ने नाम देने की कोशिश ही नहीं की।”
“क्या वह प्रेम था?”
वह कुछ देर चुप रही।
फिर बोली,
“अगर था भी, तो हमें उसे साबित करने की ज़रूरत क्यों पड़नी चाहिए?”
उस शाम मुझे समझ आया कि हर रिश्ता मंज़िल तक पहुँचने के लिए नहीं होता।
कुछ रिश्ते हमें बदलने के लिए आते हैं।
कुछ लोग हमारे साथ पूरी जिंदगी नहीं चलते, लेकिन हमारी जिंदगी की दिशा हमेशा के लिए बदल देते हैं।
Prayagraj मेरे लिए अब सिर्फ़ एक शहर नहीं है।
वह एक अधूरा संवाद है।
एक पुरानी किताब का खुला हुआ पन्ना है।
एक नदी है, जिसमें मैंने बहुत पहले अपना एक सवाल फेंका था।
और शायद उसका जवाब आज भी बह रहा है।
मीरा उस रात चली गई।
मैं फिर अकेला रह गया।
लेकिन इस बार अकेलापन पहले जैसा नहीं था।
क्योंकि मुझे पता था—
कुछ लोग जिंदगी से चले जाते हैं,
पर उनकी मौजूदगी हमारे भीतर रह जाती है।
और कुछ शहर…
हम चाहे जितनी दूर चले जाएँ,
हमारे भीतर से कभी नहीं जाते।
मेरे लिए वह शहर हमेशा Prayagraj रहेगा।
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