जिस शहर ने मुझे बार-बार बुलाया

कुछ जगहें नक्शे पर होती हैं, कुछ जगहें यादों में।

और कुछ ऐसी होती हैं, जिनका पता हमें कहीं नहीं मिलता, फिर भी हमारा मन बार-बार वहाँ पहुँचने की ज़िद करता रहता है।

मेरे लिए ऐसी ही एक जगह थी—रुद्रपुर घाट

मैं पिछले सात वर्षों से दिल्ली में रह रहा था। नौकरी, किराए का कमरा, मेट्रो की भीड़ और महीने के आख़िर में बची हुई तनख़्वाह—मेरी जिंदगी लगभग इसी घेरे में घूमती थी।

लेकिन हर कुछ महीनों बाद मेरे भीतर एक अजीब-सी बेचैनी उठती।

रुद्रपुर घाट जाने की।

मुझे खुद नहीं मालूम था कि क्यों।

वहाँ मेरा कोई परिवार नहीं था। कोई प्रेमिका नहीं थी। कोई पुरानी संपत्ति नहीं थी। यहाँ तक कि वहाँ मेरा कोई ऐसा काम भी नहीं था जिसे पूरा करने के लिए मुझे जाना पड़े।

फिर भी जब जाने की इच्छा होती, तो बाकी सारी चीज़ें बेकार लगने लगतीं।

रात को नींद नहीं आती।

मोबाइल पर बसों के टिकट देखने लगता।

कभी टिकट बुक करता, फिर पैसे देखकर रद्द कर देता।

और कुछ दिनों बाद वही बेचैनी लौट आती।

जैसे कोई भीतर से लगातार कह रहा हो—

“चलो… बस एक बार फिर वहाँ चलो।”

पहली बार मैं रुद्रपुर घाट अपने कॉलेज के दोस्त नील के साथ गया था।

वह शहर से थोड़ा बाहर एक पुराने आश्रम में काम करता था।

नील ने मेरे चेहरे को देखते ही कहा था,

“तू यहाँ घूमने आया है या भागकर आया है?”

मैं हँस पड़ा।

“फर्क?”

“बहुत फर्क है।”

उसने मुझे नदी के किनारे ले जाते हुए कहा,

“घूमने वाला आदमी वापस जाने की सोचता है। भागने वाला आदमी यहीं रुक जाने की।”

मैंने कोई जवाब नहीं दिया।

नदी उस शाम बहुत शांत थी।

उसका पानी साफ़ नहीं था। किनारे पर प्लास्टिक के टुकड़े थे, दूर किसी कारखाने की चिमनी से धुआँ निकल रहा था और हवा में मिट्टी, डीज़ल और नदी की मिली-जुली गंध थी।

फिर भी मुझे वह जगह खूबसूरत लगी।

बहुत खूबसूरत।

अजीब बात यह थी कि वहाँ खड़े होकर मुझे ऐसा लगा जैसे मैं किसी नई जगह पर नहीं, बल्कि किसी भूली हुई जगह पर वापस आया हूँ।

वहीं मेरी मुलाकात रफ़ीक़ चाचा से हुई।

सत्तर के आसपास की उम्र। लकड़ी की छोटी-सी दुकान। पुराने रेडियो, तांबे के गिलास और चाय की केतली।

उन्होंने मुझे देखकर पूछा,

“पहली बार आए हो?”

मैंने कहा, “हाँ।”

उन्होंने मेरी तरफ कुछ देर देखा और बोले,

“झूठ।”

मैं चौंका।

“क्या?”

“तुम्हारा चेहरा पहली बार आने वालों जैसा नहीं है।”

मैं हँस दिया।

“तो कैसा है?”

उन्होंने चाय का गिलास बढ़ाते हुए कहा,

“जैसे कोई अपना रास्ता भूलकर वापस आया हो।”

उस दिन से रफ़ीक़ चाचा मुझे हर बार पहचान लेते।

मैं महीनों बाद जाता, फिर भी वह दूर से आवाज़ लगाते—

“अरे शहर वाले! आज बहुत देर कर दी।”

मुझे उनका यह संबोधन अच्छा लगता था।

धीरे-धीरे मैंने रुद्रपुर की गलियाँ पहचाननी शुरू कर दीं।

पुराना घंटाघर।

पीली दीवारों वाला डाकघर।

नदी के किनारे बैठा बूढ़ा बाँसुरीवाला।

सुबह चार बजे खुलने वाली चाय की दुकान।

और वह छोटी-सी लाइब्रेरी जहाँ किताबों से ज्यादा धूल जमा थी।

मुझे वहाँ की बोली भी अच्छी लगने लगी थी।

लोग जब आपस में बात करते तो कई शब्द मुझे समझ नहीं आते।

लेकिन शायद हर भाषा समझने के लिए शब्दों की जरूरत नहीं होती।

कुछ आवाज़ें सीधे भीतर उतर जाती हैं।

एक दिन लाइब्रेरी में मुझे एक स्थानीय कवि की पुरानी किताब मिली।

नाम था—हरिनारायण ‘नीर’

मैंने पहली कविता पढ़ी और देर तक किताब बंद नहीं कर पाया।

उसमें नदी थी।

शहर था।

बिछड़ना था।

और सबसे ज्यादा—एक ऐसी जगह की तलाश थी जिसे आदमी घर कह सके।

मैं देर तक सोचता रहा कि कोई अनजान कवि मेरी जिंदगी के बारे में कैसे लिख सकता है।

उस रात मैंने नील से पूछा,

“क्या तुम्हें लगता है कि इंसान किसी जगह से प्यार कर सकता है?”

नील ने कहा,

“बिल्कुल।”

“बिना किसी वजह के?”

“प्यार की सबसे बड़ी दिक्कत ही यही है। वजह पूछो तो वह छोटा हो जाता है।”

उसका जवाब मेरे भीतर कहीं रह गया।

कुछ दिनों बाद मुझे नौकरी बदलनी पड़ी।

दिल्ली छोड़कर मुंबई जाना था।

जाने से पहले मैं आखिरी बार रुद्रपुर गया।

रफ़ीक़ चाचा ने चाय देते हुए पूछा,

“अब कब आओगे?”

मैंने कहा,

“शायद अब नहीं आ पाऊँगा।”

उन्होंने कुछ नहीं कहा।

बस नदी की तरफ देखने लगे।

फिर बोले,

“नदी से दूर जाने वाले लोग अक्सर सोचते हैं कि उन्होंने नदी छोड़ दी।”

मैंने पूछा,

“और?”

उन्होंने मुस्कुराकर कहा,

“नदी को क्या पता तुम कहाँ गए हो।”

मैं मुंबई चला गया।

नई नौकरी।

नई बिल्डिंग।

नई भीड़।

समुद्र।

लेकिन कुछ महीनों बाद एक रात अचानक मेरी आँख खुली।

खिड़की के बाहर मुंबई की बारिश थी।

और मुझे रुद्रपुर की नदी की गंध आ रही थी।

इतनी साफ़ कि मैं कुछ क्षण के लिए भूल गया कि मैं कहाँ हूँ।

मैंने उसी रात टिकट बुक कर लिया।

सुबह नील को फोन किया।

“मैं आ रहा हूँ।”

उसने बस इतना पूछा,

“फिर बुलाया?”

मैंने कहा,

“हाँ।”

“किसने?”

मैंने खिड़की से बाहर देखते हुए जवाब दिया,

“पता नहीं।”

रुद्रपुर पहुँचकर सबसे पहले मैं रफ़ीक़ चाचा की दुकान पर गया।

दुकान बंद थी।

मैंने आसपास पूछा।

किसी ने बताया कि चाचा कुछ दिन पहले गुजर गए।

मैं बहुत देर तक वहीं खड़ा रहा।

अजीब था।

जिस आदमी से मेरा कोई पारिवारिक रिश्ता नहीं था, उसकी मौत ने मुझे भीतर तक खाली कर दिया।

मैं नदी किनारे चला गया।

वही घाट।

वही हवा।

वही गंदा पानी।

लेकिन उस दिन मुझे पहली बार समझ आया कि शायद मैं नदी के लिए यहाँ नहीं आता था।

मैं उन लोगों के लिए आता था जिन्होंने मुझे कभी अपना कहे बिना अपनापन दिया था।

मैं उन गलियों के लिए आता था जहाँ मुझे अपने कदम धीमे रखने की जरूरत महसूस होती थी।

मैं उस भाषा के लिए आता था जिसमें मैं पूरी तरह अजनबी होते हुए भी अकेला नहीं लगता था।

और शायद सबसे ज्यादा…

मैं उस अपने हिस्से के लिए यहाँ आता था जिसे मैंने शहरों की भीड़ में कहीं पीछे छोड़ दिया था।

मैंने जेब से रफ़ीक़ चाचा की दी हुई पुरानी चाय की पर्ची निकाली।

उसके पीछे उन्होंने कभी मज़ाक में लिखा था—

“जहाँ दिल बार-बार जाए, वहाँ कारण मत ढूँढ़ना।”

मैं नदी के किनारे बैठ गया।

शाम उतर रही थी।

दूर मंदिर की घंटी बज रही थी।

और मुझे पहली बार लगा कि शायद home is not always a place

कभी-कभी घर एक गंध होता है।

किसी बूढ़े की आवाज़।

किसी नदी का किनारा।

किसी अनजान शहर की सड़क।

या फिर वह एहसास कि यहाँ पहुँचते ही तुम्हारे भीतर की भागती हुई दुनिया अचानक शांत हो गई।

मैंने उसी शाम तय किया कि रुद्रपुर को अब मैं “एक जगह” नहीं कहूँगा।

वह मेरी जिंदगी का वह हिस्सा था, जिसे मैंने कभी बनाया नहीं था।

बस खोज लिया था।

और शायद कुछ रिश्तों की तरह कुछ जगहें भी हमें चुनती हैं।

हम सोचते हैं कि हम वहाँ जाते हैं।

सच तो यह है—

कभी-कभी कोई जगह हमें अपने पास बुलाती रहती है, जब तक हम यह समझ न लें कि हम वहाँ क्यों नहीं, बल्कि अपने आप तक लौटने के लिए जा रहे हैं।

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