पहाड़ों का सफर हमेशा बाकी सफर से थोड़ा अलग होता है।
सड़कें घुमावदार होती हैं, खिड़की के बाहर बादल कभी पहाड़ों को छूते हैं तो कभी अचानक धुंध सब कुछ अपने अंदर समेट लेती है। और पहाड़ों की बस में बैठकर सफर करना… अपने आप में एक अलग कहानी होती है।
उस दिन भी मैं पहाड़ों की तरफ जाने वाली एक बस में बैठा था।
बस धीरे-धीरे शहर को पीछे छोड़ रही थी। खिड़की से बाहर देवदार के पेड़ दिखाई देने लगे थे। कहीं-कहीं पहाड़ों के बीच से बहता पानी और दूर तक फैली हरियाली देखकर मन अपने आप शांत हो रहा था।
मेरे बगल वाली सीट खाली थी।
कुछ देर बाद एक लड़की बस में चढ़ी और मेरी बगल वाली सीट पर आकर बैठ गई।
उसने खिड़की वाली तरफ बैठते हुए हल्की-सी मुस्कान के साथ कहा, “Excuse me…”
मैं थोड़ा सा साइड हो गया।
“Thank you,” उसने कहा और बाहर देखने लगी।
शुरुआत में हम दोनों के बीच कोई बात नहीं हुई।
वह कभी फोन देखती, कभी खिड़की से बाहर पहाड़ों को। मैं भी अपने ईयरफोन लगाए हुए रास्ते को देख रहा था।
लेकिन पहाड़ों की सड़क जैसे-जैसे ऊंची होती गई, बस के झटके भी बढ़ने लगे।
करीब एक घंटे बाद मैंने देखा कि उसके चेहरे का रंग थोड़ा बदल गया था।
वह बार-बार आंखें बंद कर रही थी और शायद खुद को संभालने की कोशिश कर रही थी।
मैंने धीरे से पूछा, “आप ठीक हैं?”
उसने बस इतना कहा, “थोड़ा सिर घूम रहा है।”
मुझे समझते देर नहीं लगी।
पहाड़ों की बस में सफर करने वालों के साथ ऐसा अक्सर होता है।
कुछ मिनट बाद उसकी तबीयत और खराब हो गई और उसे उल्टी होने लगी।
मैंने तुरंत अपना पानी आगे कर दिया और पूछा, “पानी चाहिए?”
उसने धीरे से सिर हिलाया।
मैंने बैग से एक सामान्य मोशन-सिकनेस की दवा निकाली, जो मैं सफर के लिए अपने पास रखता था, और उसे देते हुए कहा, “अगर आपको यह दवा पहले से सूट करती है और आप इसे लेती रही हैं, तभी ले लीजिए।”
उसने दवा ली और कुछ देर आंखें बंद करके सीट से टिक गई।
उस समय मेरे मन में उसके लिए कोई रोमांटिक ख्याल नहीं था।
बस एक इंसान दूसरे इंसान की मदद कर रहा था।
करीब बीस मिनट तक वह चुप रही।
फिर अचानक उसने आंखें खोलीं और बोली, “आप हमेशा ऐसे ही अजनबियों की मदद करते हैं?”
मैं मुस्कुरा दिया।
“पता नहीं… शायद जरूरत पड़ने पर।”
वह भी मुस्कुरा दी।
उस छोटी-सी मुस्कान ने जैसे पूरे माहौल को बदल दिया।
मैंने माहौल हल्का करने के लिए कहा, “अगर आप चाहें तो बात कर सकते हैं… या ईयरफोन लगाकर गाना सुन लीजिए। मन थोड़ा डाइवर्ट रहेगा।”
वह हंसते हुए बोली, “आप डॉक्टर हैं क्या?”
“नहीं।”
“फिर इतनी सलाह क्यों दे रहे हैं?”
मैंने कहा, “क्योंकि पहाड़ों की बस में बैठकर मुझे इतना अनुभव तो हो गया है कि उल्टी से ज्यादा खतरनाक उसका डर होता है।”
वह पहली बार खुलकर हंसी।
उसकी हंसी सुनकर मुझे लगा कि शायद उसकी तबीयत अब पहले से बेहतर थी।
हमने बातें शुरू कर दीं।
पहले सफर की।
फिर पहाड़ों की।
फिर पसंदीदा गानों की।
उसने बताया कि उसे बारिश बहुत पसंद है और पहाड़ों पर आते ही उसका मन शहर की भागदौड़ से दूर हो जाता है।
मैंने पूछा, “तो फिर आज की यात्रा कैसी लग रही है?”
उसने खिड़की से बाहर देखते हुए कहा, “पहले खराब लग रही थी…”
फिर मेरी तरफ देखकर बोली,
“लेकिन अब थोड़ी अच्छी लग रही है।”
मैं कुछ नहीं बोला।
बस मुस्कुरा दिया।
शायद कुछ बातें जवाब मांगती ही नहीं हैं।
बस अपनी जगह दिल में उतर जाती हैं।
कुछ देर बाद उसने अपना ईयरफोन मेरी तरफ बढ़ाया।
“एक गाना सुनेंगे?”
मैंने कहा, “कौन सा?”
“बस सुनिए… पसंद नहीं आया तो बदल देना।”
हम दोनों एक ही गाने को अलग-अलग ईयरफोन से सुनने लगे।
बाहर पहाड़ थे।
खिड़की पर बारिश की छोटी-छोटी बूंदें थीं।
बस घुमावदार रास्तों पर आगे बढ़ रही थी।
और उस पल ऐसा लग रहा था जैसे बाकी पूरी दुनिया थोड़ी देर के लिए रुक गई हो।
कभी-कभी जिंदगी में बड़े-बड़े रिश्ते किसी बड़े मौके से शुरू नहीं होते।
कभी एक सीट से शुरू होते हैं।
कभी एक सवाल से।
कभी किसी को दिया हुआ पानी का गिलास रिश्ता बना देता है।
और कभी किसी अनजान इंसान की तबीयत खराब होना… दो अजनबियों को इतना करीब ले आता है कि सफर खत्म होने का डर लगने लगता है।
बस आखिरकार अपने गंतव्य के करीब पहुंचने लगी।
वह अपना सामान संभालने लगी।
मैंने मन ही मन सोचा—शायद अब यह मुलाकात यहीं खत्म हो जाएगी।
बस रुकी।
वह नीचे उतरने लगी।
फिर अचानक पलटकर मेरी तरफ देखी और बोली,
“आज अगर आप मेरी बगल वाली सीट पर नहीं बैठे होते, तो शायद मेरा सफर बहुत खराब होता।”
मैंने मुस्कुराकर कहा,
“और अगर आप मेरी बगल वाली सीट पर नहीं बैठतीं, तो मेरा सफर शायद थोड़ा कम खूबसूरत होता।”
वह कुछ सेकंड चुप रही।
फिर मुस्कुराई।
“फिर अगली बार सफर में दवा साथ रखिएगा।”
मैंने पूछा, “क्यों?”
उसने कहा,
“क्योंकि हो सकता है अगली बार फिर मेरी सीट आपके बगल में हो।”
वह चली गई।
बस फिर आगे बढ़ गई।
लेकिन इस बार पहाड़ वही थे, रास्ते वही थे और बारिश भी वही थी…
बस मेरे सफर में कुछ बदल चुका था।
एक अनजान लड़की अब अनजान नहीं लग रही थी।
और उस दिन मुझे समझ आया कि प्यार हमेशा पहली नजर में नहीं होता।
कभी-कभी प्यार…
पहले एक सफर में मिलता है, फिर एक मुस्कान में ठहरता है और धीरे-धीरे दिल का हिस्सा बन जाता है।






