वे चुम्बन जो जिस्म से रूह तक का सफ़र करते हैं

सबसे खूबसूरत होते हैं वे चुम्बन जो जिस्म से रूह तक का सफ़र करते हैं

शहर की उस छोटी-सी लाइब्रेरी में शाम हमेशा थोड़ी उदास होती थी।

खिड़की के बाहर भागती गाड़ियाँ, अंदर किताबों की खामोशी और बीच-बीच में पन्ने पलटने की आवाज़—बस यही दुनिया थी अनया की।

उम्र तीस के करीब थी। नौकरी अच्छी थी, घर भी अपना था, लेकिन जिंदगी में एक ऐसी जगह खाली थी जिसे वह किसी से कह नहीं पाती थी।

फिर एक दिन उसी लाइब्रेरी में विहान आया।

वह किताबें खरीदने नहीं, अपने पिता के लिए किताब ढूँढ़ने आया था। पिता अस्पताल में थे और डॉक्टरों ने ज्यादा उम्मीद नहीं दी थी।

अनया ने उसे एक पुरानी किताब ढूँढ़कर दी।

विहान ने मुस्कुराकर कहा,
“आपको कैसे पता कि यही चाहिए थी?”

अनया ने जवाब दिया,
“पता नहीं… शायद किताबों को पढ़ते-पढ़ते लोगों के चेहरे पढ़ना आ जाता है।”

विहान पहली बार खुलकर हँसा।

यही उनकी पहली मुलाकात थी।

फिर मुलाकातें बढ़ने लगीं।

कभी चाय के कप के साथ, कभी लाइब्रेरी की सीढ़ियों पर, कभी बारिश में बस का इंतजार करते हुए।

विहान बहुत बातें नहीं करता था। लेकिन जब करता था, अनया ध्यान से सुनती थी।

एक दिन उसने पूछा,
“तुम इतने चुप क्यों रहते हो?”

विहान ने कुछ देर सड़क की तरफ देखा।

“क्योंकि कुछ लोगों के जाने के बाद इंसान बोलना नहीं, सिर्फ सुनना सीख जाता है।”

अनया ने उस दिन कोई सवाल नहीं किया।

बस उसका हाथ धीरे से पकड़ लिया।

वह पहला स्पर्श था, जिसमें प्रेम से ज्यादा भरोसा था।

कुछ महीनों बाद विहान के पिता चल बसे।

उस रात अनया उसके घर पहुँची। विहान कमरे के कोने में बैठा था। सामने पिता की तस्वीर थी।

वह रो नहीं रहा था।

अनया उसके पास बैठ गई।

काफी देर तक दोनों खामोश रहे।

फिर विहान ने धीमे से कहा,
“आज मुझे समझ आया कि किसी अपने के चले जाने के बाद घर कितना बड़ा हो जाता है।”

अनया की आँखें भर आईं।

उसने अपना सिर उसके कंधे पर रख दिया।

विहान ने पहली बार उसे अपने करीब खींचा।

दोनों की आँखें बंद थीं।

और फिर अनया के माथे पर एक बहुत हल्का-सा चुम्बन था।

उस चुम्बन में कोई जल्दबाजी नहीं थी।

वह जैसे कह रहा था—
“मैं हूँ… और अभी कहीं नहीं जा रहा।”

समय गुजरता गया।

उनका रिश्ता गहरा होता गया, लेकिन जिंदगी हमेशा प्रेम की तरह आसान नहीं होती।

अनया की माँ को यह रिश्ता मंजूर नहीं था।

“विहान के पास अपना घर नहीं है, परिवार नहीं है। तुम क्यों अपनी जिंदगी मुश्किल कर रही हो?”

अनया ने सिर्फ इतना कहा,
“क्योंकि उसने मेरी जिंदगी आसान बनाने का वादा नहीं किया… उसने मुश्किल समय में मेरा हाथ पकड़ने का वादा किया है।”

लेकिन एक दिन विहान को दूसरे शहर में नौकरी मिल गई।

दोनों ने सोचा था कि दूरी कुछ महीनों की होगी।

लेकिन महीनों ने साल का रूप ले लिया।

फोन कम होने लगे।

मैसेज छोटे हो गए।

एक रात अनया ने पूछा,
“क्या हमारे बीच अब भी कुछ बचा है?”

बहुत देर तक कोई जवाब नहीं आया।

फिर विहान का संदेश आया—

“तुम मेरे लिए बहुत जरूरी हो… शायद इसलिए तुम्हें खोने से डरता हूँ।”

अनया ने फोन बंद कर दिया।

उसे पहली बार समझ आया कि कभी-कभी प्यार खत्म नहीं होता, बस थक जाता है।

दो साल बाद विहान वापस आया।

उसी शहर में।

उसी लाइब्रेरी में।

अनया किताबों की अलमारी के सामने खड़ी थी।

पीछे से आवाज आई—

“किताबों को पढ़ते-पढ़ते लोगों के चेहरे पढ़ना अब भी आता है?”

अनया पलटी।

विहान सामने खड़ा था।

बालों में थोड़ी सफेदी आ गई थी। चेहरे पर थकान थी।

लेकिन आँखें वही थीं।

अनया कुछ नहीं बोली।

विहान उसके पास आया।

“मैंने बहुत देर कर दी।”

अनया की आँखों से आँसू निकल पड़े।

“हाँ।”

“माफ करोगी?”

वह कुछ पल उसे देखती रही।

फिर बोली—

“माफ तो उसी दिन कर दिया था… जिस दिन तुम्हें सबसे ज्यादा मेरी जरूरत थी और मैं तुम्हारे पास नहीं पहुँच पाई थी।”

विहान ने उसका चेहरा दोनों हाथों में थाम लिया।

इस बार उसने उसके माथे को चूमा।

फिर आँखों को।

और आखिर में उसके होंठों को।

वह चुम्बन लंबा नहीं था।

लेकिन उसमें दो साल की दूरी, अनकही शिकायतें, इंतजार, डर और लौट आने की राहत सब कुछ था।

अनया ने उसकी छाती पर सिर रख दिया।

विहान ने धीरे से कहा—

“पता है, सबसे सुंदर चुम्बन कौन-से होते हैं?”

अनया ने आँखें बंद रखते हुए पूछा,
“कौन-से?”

“जो होंठों से शुरू होकर आत्मा तक पहुँच जाएँ।”

अनया मुस्कुरा दी।

उस दिन दोनों ने कोई बड़ा वादा नहीं किया।

बस साथ घर की तरफ चल पड़े।

क्योंकि कुछ रिश्तों को शादी के वादों से ज्यादा एक-दूसरे की मौजूदगी की जरूरत होती है।

और शायद प्रेम का सबसे खूबसूरत रूप वही है—

जब किसी का चुम्बन शरीर को नहीं, भीतर टूट चुके इंसान को छू जाए।

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